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आमार जीवन सदा पापे रत

आमार जीवन सदा पापे रत नहीं कोई पुण्य लेश अन्यों को उद्वेग दिया अनंत, दिया जीवों को क्लेश। निजसुख हेतु पाप से नहीं डर दयाहीन मैं स्वार्थपर पर सुखे दुखी सदा मिथयाभाषी परदुख सुखकर। अशेष कामना, हृदय में मेरी क्रोधी मैं दम्भपरायण महामत्त सदाविष्ये मोहित हिंसा गर्व विभूषण। आत्म निवेदन , तव चरणे कर, हुआ परम सुखी दुखदूर गया,चिंता न रहा, नित्यानन्द दर्शन पाकर अशोक अभय अमृत आधार तुम्हारे चरण द्वय तुम्हारा संसार करूंगा सेवन। न होऊँगा फल भागी। तव सुख हेतु करूंगा यत्न होकर श्रीचरण अनुरागी।। तुम्हारी सेवा से दुख यदि हो वह तो परम सुख। सेवा सुख दुख परम सम्पद नाशे अविद्या दुख। पूर्व इतिहास भूला हूँ सकल सेवा सुख पाकर मने। हम हैं तुम्हारे तुम हो हमारे क्या कार्य पर धने। भक्तिविनोद कहे प्रभु नित्यानन्द ततसेवा अति सुखकर

mc 94

मीरा चरित  भाग- 94 मेरी दृष्टि वक्ष पर टिकी और तनिक भी प्रतिकार न करते देखकर उन्होंने भी अपने वक्ष की ओर माथा झुकाया- ‘क्या देख रही है री मेरी छाती पर?’ एक हाथ छुड़ाकर दाहिने वक्ष पर पद चिह्न के आकार के लांछन पर हाथ धरते हुये मैं बोली- ‘यह’ ‘यहक्या आज ही देखा है तूने? यह तो जन्म से ही है, मेरी मैया कहती है।मेरे मोहढ़े से भी यह अधिक सुंदर है।’ मेरी पलक एकबार उठ कर फिर झुक गई।मन की दशा कही नहीं जाती। ‘अरी रोती क्यों है? तुम छोरियों में यह बहुत बुरी आदत है।होरी को सारो ही मजो किरकिरो कर दियो’- उन्होंने अँजलि में मुख लेकर कहा- ‘कहा भयो, बोल?’ हाथ छुटे तोमैनें चपलता से उनकी पीठ पर भी गुलाल मली तो छुड़ा लिए और छिटक कर दूर जा खड़ी हुई।इसी बीच मेरी ओढ़नी का छोर उनके हाथ में आ गया।उन्होंने झटके से उसे खींचा तो मैं उघाड़ी हो गई।अब तो लज्जा का अंत न रहा।दौड़ कर आम के वृक्ष के पीछे छिपकर खड़ी हो गई। ‘ऐ मीरा, चुनरी ले अपनी। मैं इसका क्या करूँगा?’- उन्होंने कहा।  ‘वहीं धर दो, मैं ले लूँगी’- मैंने धीरे से कहा।  ‘लेनी है तो आकर ले जा। नहीं तो मैं बरसाने जा रहा हूँ।’ ‘नहीं, नहीं, तुम्हीं यहाँ आकर दे जा

mc 46

मीरा चरित  भाग- 46 भाणेज बावजी (जयमलजी) ने केवल कटार से आखेट में झुंड से अलग हुए एकल सुअर को पछाड़ दिया। हमारे महाराज कुमार जब आखेट पधारते हैं तो सिंह के सामने पधार ललकारकर मारते हैं। हाथी और सुअरों से युद्ध करते....।' भोजराज ने बायाँ हाथ ऊँचा करके पीछे खड़ी जीजी को बोलने से रोक दिया। मंडप से उठकर जनवासे में कुलदेव, पिताजी, पुरोहितजी को प्रणाम कर लौटे। दोनों को एक कक्ष में पधरा दिया गया। द्वार के पास निश्चिन्त मन से खड़ी मीरा को देखकर भोजराज धीमे पदों से उसके सम्मुख आ खड़े हुए। 'मुझे अपना वचन याद है। आप चिन्ता न करें। जगत् और जीवन में मुझे आप सदा अपनी ढाल पायेंगी।' उन्होंने गम्भीर मीठे स्वर में कहा। थोड़ा हँसकर वे पुनः बोले—'यह मुँह दिखायी का नेग, इसे कहाँ रखूँ?' उन्होंने खीसे में से हार निकालकर हाथ में लेते हुए कहा। मीरा ने हाथ से झरोखे की ओर संकेत किया। 'यहाँ पौढ़ने की इच्छा हो तो.... अन्यथा नीचे पधारें। ज्यों मन मानें।'- भोजराज ने कहा। 'एकलिंग के सेवक पर अविश्वास का कोई कारण नहीं दिखायी देता, फिर मेरे रक्षक कहीं चले तो नहीं गये हैं।'-मीरा ने आँचल

mc 45

मीरा चरित  भाग- 45 इन चूड़ियों में से, जो कोहनी से ऊपर पहनी जाती हैं उन्हें खाँच कहते हैं) गलेमें तमण्यों (यह भी ससुराल से आनेवाला गले का आभूषण है, जिसे सधवा स्त्रियाँ मांगलिक अवसरों पर पहनती हैं) छींक और बीजासण, नाक में नथ, सिर पर रखड़ी (शिरोभूषण) हाथों में रची मेंहदी, दाहिनी हथेली में हस्तमिलाप का चिह्न और साड़ी की पटली में खाँसा हुआ पीताम्बर का गठजोड़ा, चोटी में गूँथे फूल और केशों में पिरोये गये मोती, कक्ष में और पलंग पर फूल बिखरे हुए हैं। "यह क्या मीरा! बारात तो अब आयेगी न?"– राणावतजी ने हड़बड़ाकर पूछा।  “आप सबको मुझे ब्याहने की बहुत हौंस थी न, आज पिछली रात को मेरा विवाह हो गया।" – मीरा ने सिर नीचा किये पाँव के अँगूठे से धरा पर रेख खींचते हुए कहा- 'प्रभु ने कृपाकर मुझे अपना लिया भाभा हुकम! मेरा हाथ थामकर उन्होंने भवसागर से पार कर दिया।' उसकी आँखों में हर्ष के आँसू निकल पड़े। 'पड़ले (बारात और वर के साथ वधू के लिये आने वाली सामग्री को पड़ला या बरी कहा जाता है) में आये हैं भाबू! पोशाकें, मेवा और शृंगार सामग्री भी है वे इधर रखे हैं। आप देख सँभाल लें।'– मीर

mc 21

मीरा चरित  भाग- 21 पथ पाकर जैसे जल दौड़ पड़ता है, वैसे ही मीराकी भाव-सरिता भी शब्दोंमें ढलकर पदोंके रूपमें उद्दाम होकर बह चली। मेरे नयना निपट बंक छवि अटके।  देखत रूप मदन मोहन को पियत पीयूख न भटके।  बारिज भवाँ अलक टेढ़ी मनो अति सुगन्ध रस अटके।।  टेढ़ी कटि टेढ़ी कर मुरली टेढ़ी पाग लर लटके।  मीरा प्रभु के रूप लुभानी गिरधर नागर नट के। मीराको प्रसन्न देखकर मिथुला समीप आयी और उसने गलीचेको थोड़ा समेटते हुए सम्मानपूर्वक घुटनोंके बल बैठकर धीमे स्वरमें कहा– "जीमण पधराऊँ (भोजन लाऊँ)?" 'अहा मिथुला, अभी ठहर जा अभी प्रभुको रिझा लेने दे। कौन जाने ये परम स्वतंत्र कब निकल भागें। आज प्रभु पधारे हैं तो यहीं क्यों न रख लें? किसी प्रकार जाने न दें- ऐसो प्रभु जाण न दीजे हो।  तन मन धन करि बारणे हिरदे धरि लीजे हो।।  आव सखी! मुख देखिये नैणा रस पीजै हो।  जिण जिण बिधि रीझे हरि सोई कीजे हो।।  सुन्दर श्याम सुहावणा मुख देख्याँ जीजे हो। मीरा के प्रभु श्यामजी बड़भागण रीझे हो। मीरा जैसे धन्यातिधन्य हो उठी। लीला चिन्तनके द्वार खुल गये और अनुभव की अभिव्यक्ति के भी। दिनानुदिन उसके भजन-पूजनका चाव बढ़ने लगा।

mc 133विश्राम

मीरा चरित  भाग- 133 कई क्षण तक लोग किंकर्तव्यविमूढ़ से रहे।किसी की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ। एकाएक चमेली ‘बाईसा हुकम’ पुकारती हुई निज मंदिर के गर्भ गृह की ओर दौड़ी। पुजारी जी ने सचेत होकर हाथ के संकेत से उसे रोका और स्वयं गर्भ गृह में गये। उनकी दृष्टि चारों ओर मीरा को ढूँढ रही थी। अचानक प्रभु के पार्श्व में लटकता भगवा-वस्त्र खंड दिखाई दिया।वह मीरा की ओढ़नी का छोर था। लपक कर उन्होंने उसे हाथ में लिया, पर मीरा कहीं भी मन्दिर में दिखाई नहीं दीं। निराशा के भाव से भावित हुए पुजारीजी गर्भ गृह से बाहर आये और उन्होंने निराशा व्यक्त करने करने के सिर हिला दिया। उनका संकेत का अर्थ समझकर, मेवाड़ और मेड़ता के ही नहीं, वहाँ उपस्थित सभी जन आश्चर्य विमूढ़ हो गये।  ‘यह कैसे सम्भव है? अभी तो हमारे सामने उन्होंने गाते गाते गर्भ गृह में प्रवेश किया है। भीतर नहीं हैं तो फिर कहाँ हैं? हम अपने स्वामी को जाकर क्या उत्तर देंगें?’- मेवाड़ी वीर बोल उठे।  ‘मैं भी तो आपके साथ ही बाहर था। मैं कैसे बताऊँ कि वह कहाँ गईं? अगर आप समझना चाहो तो समझ लो कि मीरा बाई प्रभु में समा गईं, प्रभु श्री विग्रह में विलीन हो गईं

mc132

मीरा चरित  भाग- 132 संख्या की बहुलता के कारण सम्भव नहीं लगता था, अतः यह निश्चित हुआ कि सर्वप्रथम एक-एक दिन आठों पटरानियाँ भोजन का आयोजन करें, एक दिन महाराज उग्रसेन और कुछ दिन ऐसे ही प्रधान-प्रधान सामंतो के यहाँ। अंत में पाँच पाँच सौ महारानियाँ मिलकर एक-एक दिन भोजन का आयोजन करें।इस प्रकार थोड़े समय में ही सबको सुयोग प्राप्त हो जायेगा।निश्चय के अनुसार ही व्रजवासियों का भोजन और स्नेहाभिसिक्त स्वागत सत्कार हुआ।  श्री किशोरी जू के शील, सदाचार, सरलता और सौन्दर्य पर महारानी वैदर्भी जी ऐसे मुग्ध हुईं, जैसे अपने ही प्राणों के साथ देह का लगाव होता है। वे बार-बार उन्हें आमंत्रित करतीं, अपने ही सुकुमार हाथों से रंधन कार्य करतीं और अतिशय प्रेम एवं अपार आत्मीयता पूर्वक अपने हाथों से जिमाती। कभी-कभी दोनों एक ही थाली में भोजन करतीं और प्रभु की बातें चर्चा करते हुए ऐसी घुल-मिल जातीं कि लगता जैसे दो सहोदरा बहिनें बहुत काल पश्चात मिली हों। भानुनन्दिनी अकेली नहीं पधारतीं थीं, उनके साथ दो-चार सखियाँ अवश्य ही होतीं। एक बार उनके साथ आप भी पधारी थीं। द्वारिकाधीश की पट्टमहादेवी साक्षात लक्ष्मीरुपा वैदर्भी के म

mc 131

मीरा चरित  भाग- 131 यह बूढ़ा ब्राह्मण आज अपनी यजमान वधू से मेवाड़ री रक्षा की भीख माँगता है’- राजपुरोहित जी ने सिर से साफा उतारकर भूमि पर रखा- ‘मेरी इस पाग की लाज आपके हाथ में है स्वामिनी।हमें सनाथ करो।हम अनाथ हो गए हैं’- दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने धरती पर मस्तक रखा और बिलख कर रो पड़े। मेड़ते के राजपुरोहित उठकर कक्ष में आए।मीरा ने भूमि पर सिर रख उन्हें प्रणाम किया और आसन ग्रहण करने की प्रार्थना की। पुरोहित जी के साथ ही हरिसिंह जी और रामदास जी भी कक्ष में आये। उन्होंने मीरा को प्रणाम किया। सबने आसन ग्रहण किया और आज्ञा पाकर बैठ गये।सबके मुख-मलीन थे। मेड़ते के राजपुरोहित जी कहने लगे- ‘बाईसा हुकम ! केवल आपका श्वसुर कुल ही आपदाग्रस्त नहीं है, पितृकुल भी तितर-बितर हो गया है।मेरे पिता ने युद्ध करते हुये वीरगति प्राप्त की और माँ सती हो गई।आपके भाई भतीजे विपदा के मारे पैतृक राज्य खोकर जीविका के लिए भटक रहे हैं।महाराज के दो पुत्र मारवाड़ और मालवा पधार गये।महाराणा ने बदनोर परगना प्रदान किया था, उस पर उसके पाँचवे पुत्र मुकुन्ददास जी गद्दी पर विराजते हैं।एक बार महाराज मुकुन्द दासजी क् पूछने पर किसी