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मोर पंख आँचल सखी@

मोर पंख कितना भाग्यशाली है न यह...कान्हा जिसे स्वयं अपने शीश पर स्थान दिये।वह भाग्यशाली तो है ही।यह झूम झूमकर इठलाता हुआ अपने भाग्य पर बडा मान करता है।आज प्रियाजी ने अपने सु...

सखी री आयो री

सखी री आयो मेरो पियो को संदेस । कीजौ सिंगार री मेरो आवे है बृजेश ।। पिया बिनहुँ नाँहि प्राण धरूँ पिया मेरो प्राण । प्रेम ताहीँ धरूँ सखी निज देह माँहि प्राण ।। ऐसो मेरो पिया स...

सेवा

सेवा "सेवा" प्रथम तो सेवा एक सौभाग्य है । कोई कर्म नहीं , जै जै की ही कृपा है । कर्म कहने में लालच है , लोभ है । और सौभाग्य -कृपा मान लेने में रस और नित्य सेवा का नित्य नव आनन्द। कर्म ...

समाधियों की प्रकार

*समाधियों के प्रकार* समाधियां 4 प्रकार की होती हैं- 1)दन्त समाधि 2)अस्थि समाधी 3)पुष्प समाधी 4)सम्पूर्ण समाधि दन्त समाधि,अस्थि समाधि,पुष्प समाधि किसी सन्त को अनेक जगहों पर दी जा स...

तुलनात्मक अध्यनन

|| तीनों योगों का तुलनात्मक अध्ययन || क्रम संख्या ज्ञानयोग | कर्मयोग | भक्तियोग | [ १ ] आध्यात्मिक साधना | भौतिक साधना | आस्तिक साधना | [ २ ] जानने की शक्ति | करने की शक्ति | मानने की शक्ति | [ ...

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प्रियतम प्रभु की प्रेम-साधना' प्रेम भगवान का साक्षात स्वरूप ही है। जिसे विशुद्ध सच्चे प्रेम की प्राप्ति हो गयी, उसे भगवान मिल गये- यह मानना चाहिये। प्रेम न हो तो रूखे-सूखे भ...

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प्रियतम प्रभु की प्रेम-साधना 2 प्रियतम प्रभु की प्रेम-साधना इसी कारण साक्षात अपने में अर्थात 'स्व' में प्राणि का सर्वाधिक प्रेम होता है। इसलिये भगवान प्राण के प्राण, जीव के ...