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।।श्रीहरिः।। सखाओं का कन्हैया (ठाकुर श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र') ----------------------------------------                 7. गायक          श्याम गा रहा है–अस्फुट स्वर में कुछ गा रहा है। गुनगुना रहा है, कहना चाहिये।          वृन्दावनका संघन भाग–अधिकांश वृक्ष फल-भार से झुके हैं और उन पर हरित पुष्पगुच्छों से लदी लताएँ चढ़ी लहरा रही हैं। भूमि कोमल तृणों से मृदुल, हरी हो रही है।          वृक्षों पर कपि हैं और अनेक प्रकार के पक्षी हैं। पूरे वन के कपि और पक्षी मानो यहीं एकत्र हो गये हैं; किन्तु इस समय न कपि कूदते- उछलते हैं, न पक्षी बोलते हैं। सब शान्त-निस्तब्ध बैठे हैं। एक भ्रमर तक तो गुनगुनाता नहीं; क्योंकि श्याम गा रहा है।          गायें-सहस्रों गायें, अनेक रंगों की गायें हैं, जो प्रायः छोटी हथिनियों जैसी बड़ी हैं, स्वस्थ हैं, मोटी हैं, भारी अयान हैं उनके और सचल पर्वत जैसे वृषभ हैं, छोटे-बड़े बछड़े-बछड़ियाँ हैं। सबके सींग सजे हैं। सबके गले में अनेक रंगों ...

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।।श्रीहरिः।।  सखाओं का कन्हैया (ठाकुर श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र') ----------------------------------------            (6). न्यायशास्त्री           'अरे, तूने फिर ये कपि एकत्र कर लिये ?' माँ रोहिणी जानती हैं कि इस नीलमणि के संकेत करते ही कपि ऊपर से प्रांगण में उतर आते हैं। उन्हें डर लगता है, कपि चपल होते हैं और यह कृष्णचन्द्र बहुत सुकुमार है। यह भी कम चपल नहीं है। चाहे जब कपियों के बच्चों को उठाने लगता है। उस दिन मोटे भारी कपि के कन्धे पर ही चढ़ने लगा था। कपि चाहे जितना इसे मानें, अन्तः पशु ही हैं। वे इसे गिरा दे सकते हैं।           माता बार-बार मना करती हैं कि–'कपियों को प्रांगण में मत बुलाया कर ! मैं इनके लिए भवन के ऊपर रोटी फेंक दिया करूँगी।' लेकिन श्याम मानता नहीं है। माता और मैया यशोदा के तनिक हटते ही हाथ हिलाकर कपियों को बुला लेता है।           ये कपि भी तो कहीं जाते नहीं हैं। पता नहीं कब की कन्हाई से इनकी मित्रता है। रात्रि में भी नन्द भवन के ऊपर अथवा आसपास ही रहेंगे। प्रात:...

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।।श्रीहरिः।। सखाओं का कन्हैया (ठाकुर श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र') ----------------------------------------              (5). भोला           'कनूँ ! खूब मधुर, बहुत स्वादिष्ट पायस है।' भद्र अपने सम्मुख केशर पड़ा सुरभित पायस से परिपूर्ण पात्र लिये बैठा है। 'तू खायेगा ?'           'खाऊँगा !' कोई स्नेह से बुलावे तो ब्रजराजकुमार भोग लगाने न आ बैठे ऐसा नहीं हो सकता। अब श्यामसुन्दर भद्र के समीप आकर बैठ गया है।           श्याम और भद्र दोनों बालक हैं। दोनों लगभग समान वय के हैं। इन्दीवर सुन्दर कन्हाई और गोधूम गौर भद्रसेन। दोनों की कटि में पीली कछनी है; किन्तु कृष्ण के कन्धे पर पीताम्बर पटुका है, भद्र का पटुका नीला है। दोनों के पैरों में नूपुर हैं, कटि में स्वर्ण मेखला है, करों में कंकण, भुजाओं में अंगद हैं। कौस्तुभ तो केबल कृष्णचन्द्र का कण्ठाभरण है, जैसे श्रीवत्स इसी के वक्ष का चिन्ह है; किन्तु मुक्तामाल, गुञ्जामाल दोनों ने पहन रखी हैं। दोनों के बड़े-बड़े नेत्र अञ्जन-रञ्जित हैं। दोनों के भाल...

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।।श्रीहरिः।।  सखाओं का कन्हैया (ठाकुर श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र') ----------------------------------------                                               ३-सचिन्त           भद्र ! बाबा, भद्र कहाँ है ?' ऐसा तो कभी नही हुआ कि श्याम गोदोहन करने गोष्ठ में आ जाय और भद्र उसे दोहिनी लिये न मिले। आज भद्र कहाँ गया ? कन्हाई ने भद्र को इधर उधर देखा, पुकारा और फिर अपने दाहिने हाथ की दोहनी बांयें हाथ में लेते हुए बाबा के समीप दौड़ गया।           राम-श्याम दोनों भाई प्रातःकाल उठते ही मुख धोकर पहिले गो-दोहन करने गोष्ठ में आते हैं। प्रातःकृत्य गोदोहन के पश्चात् होता हैं। बाबा के साथ ही भद्र सोता है। उनके साथ ही दोहनी लिये सबेरे दोनों भाइयों को गोष्ठ में मिलता है। लेकिन आज वह दीखता नहीं है।           'तुम आ गये ?' बाबा ने भुजाएँ बढ़ाकर श्याम को अंक में लेना चाहा। उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ती है इन बालकों के आने...

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।।श्रीहरिः।। सखाओं का कन्हैया ( ठाकुर श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र') ----------------------------------------          (4) अपनों का ही             'सुना कि कोई बहुत बड़ा मल्ल आने वाला है।' गोपियों को गोपों को, सबको ही कोई बात, कोई बहाना चाहिये जिससे नन्दनन्दन उनके समीप दो क्षण अधिक ठहरे। यह चपल कहीं टिकता नहीं, इसलिए इस गोपी ने कोई बात निकाली है।           'मल्ल ? मल्ल तो अपना विशाल दादा है।' कन्हाई को ऐसी कोई विशेषता नहीं ज्ञात जो उसके सखाओं में उसे न दीखे। संसार में कहीं और कुछ भी विशिष्ट गुण-कर्म किसी में सम्भव है, यह बात यह सोचना ही नहीं चाहता।           'एक बड़े भारी तपस्वी भी आज महर्षि शाण्डिल्य के आश्रम में आने वाले हैं। श्यामसुन्दर की रुचि मल्ल में नहीं है तो गोपी को कोई और समाचार सोचना ही चाहिये।           'तू जाकर मैया को बतला दे!' नन्दनन्दन स्वयं क्या करे तपस्वी का। मैया बाबा को कह देगी। बाबा जाकर उनका सत्कार कर आवेगे अथवा मैया उन्हें भवन में बुलाब...

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।।श्रीहरिः।। सखाओं का कन्हैया (ठाकुर श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र') ----------------------------------------        (2)-उलझन में           राम श्याम दोनों आकर द्वार के बाहर खड़े ही हुए थे कि एक तितली कहीं से उड़ती आयी और दाऊ की अलकों पर बैठ गयी। कन्हाई यह कैसे सहन कर लें कि यह क्षुद्र प्राणी उसके अग्रज के सिर पर ही बैठे; किन्तु तितली को हटाने के लिए हाथ बढ़ाया तो वह अलकों से उड़कर इसके दाहिने हाथ की नन्हीं मध्यमा अँगुली पर ही आ बैठी। इतनी सुकुमार, इतनी अरुण अँगुली– तितली को बैठने के लिए इससे अधिक मृदुल, सुन्दर सुरभित कुसुम भला कहाँ मिलने वाला है।           अब श्याम उलझन में पड़ गया है। वह अपनी अँगुली पर बैठी इस छोटी पीली तितली का क्या करे ? बड़े भाई की ओर हाथ बढ़ाकर दिखलाता है कि दादा इसे भगा दे यहाँ से।           दाऊ का काम–इनका स्वभाव तो श्याम के समीप से प्राणियों को भगाना नहीं है। ये तो अपने छोटे भाई तक प्राणियों को पहुँचाने वाले हैं। तितली को भगाना तो दूर रहा, अनुज की अँगुली पर बैठा यह नन्हा प्...

सखाओं के कन्हैया 1

।।श्रीहरिः।। सखाओं का कन्हैया (ठाकुर श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र') ----------------------------------------    (1)-तन्मय           यह कन्हाई अद्भुत है, जहाँ लगेगा, जिससे लगेगा, उसी में तन्मय हो जायगा और उसे अपने में तन्मय कर लेगा।           श्रुति कहती है-                         'रूपं-रूपं प्रतिरूपो बभूव।'           वह परमात्मा ही जड़-चेतन, पानी-पत्थर, पेड़-पौधे, अग्नि-वायु-आकाश पशु-पक्षी, कीड़े-पतंगे, सूर्य, चन्द्र-तारे सब बन गया है, किन्तु मैं उस किसी अलक्ष्य, अगोचर, अचिन्त्य परमात्मा की बात नहीं करता हूँ। मैं करता हूँ इस अपने नटखट नन्हें नन्द-नन्दन की बात। यह केवल स्वयं तन्मय नहीं हो जाता, दूसरे को भी अपनेमें तन्मय कर लेता है|           ऐसा नहीं है कि यह केवल श्रीकीर्तिकुमारी या दाऊ दादा में तन्मय-एकरूप हो जाता हो। यह क्या अपनी वंशी अधरों पर रखता है तो स्वर से कम एकाकार होता है ? अथवा किसी गाय, बछड़े-बछड़ी को दुलराने-पु...