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राधेश्याम एक आसने

राधाश्याम एकासने सेजेछे भालो। राइ आमादेर हेमवरणी, श्याम चिकणकालो।। गले वनफूलेर माला, वामे चूड़ाटि हेला। जुगलरूपे निकुंजवन करेछे आलो।। (दोहाँर) बाहुते बाहु, जेन चाँदेते राहु। चूड़ा वेणी घेराधेरि करि दाँडालो।। करे मोहन मुरली, राइ अंगे पड़िछे ढलि। भानु दुलाली मोदेर नन्द दुलाल।। (जत) सखी मंजरी, तारा जाय सारि सारि। माझे किशोर-किशोरी, कि शोभाह'लो।। (जत) बरज बाला, रूपे दशदिक हइल आलो। जुगल चाँदे घेरि चाँदेर माला चलिलो।। (नाचे) मयूर-मयूरी, गाय शुक आर सारी। जुगलरूप हेरि सबार नयन जुड़ालो।। (तोरा) आय सहचरि, हेरबि जदि जुगल माधुरी। मेघ बिजुरी जड़ाजड़ि कि शोभाहलो।।

निताई गौरांग नाम

*निताइ-गौराङ्ग का नाम लेने से प्रेम उमड़ता है, अश्रुधार बहती है; जो अपराध की बात तक नहीं सोचते; जो अपराधी का अपराध दिखाकर और अपराध-मोचन का उपाय बताकर अथवा स्वयं उपाय कर प्रेम-दान करते हैं, ऐसे परमदयाल प्रेमदाता-शिरोमणि श्रीनिताइ-गौराङ्ग की यह अपार करुणाराशि जिसके हृदय में संचारित होती है, उसके लिए क्या और कोई साधन-भजन करना बाकी रह जाता है? या किसी और प्रकार के भजन-साधन के लिए क्या उनके मन में उत्कण्ठा पैदा हो सकती है?*

राधा रानी की दासी

*'मैं राधारानी की दासी हूँ' यदि यह विश्वास मन में दृढ़ न हो, तो कातर भाव से निताइ-गौराङ्ग के निकट प्रार्थना करो प्रभु, मैं कलिहत जीव हूँ; मायामुग्ध हो संसार-सागर में आ गिरा हूँ।आप करुणामय हैं, करुणाकर इस बन्धन से मुक्त कीजिये। हे प्रभु, आपकी कृपा के अतिरिक्त मुझ जैसे पाखण्डी के उद्धार का और कोई साधन नहीं।' इसप्रकार का भाव रखो और 'हा निताइ गौराङ्ग !' कहकर रोओ; हृदय निर्मल हो जायगा।'*

निताई नागर

*'निताइ नागर, रसेर सागर,सकल रसेर गुरु।* *जे जाहा चाय, तारे ताहा देय,वांछाकल्पतरु।।* *(निताइ) राधार समान कृष्णे करे मान,सतत थाकये संगे।* *बसि थाकि थाकि, उठये चमकि,कृष्णकथा रसरंगे।।* *बसि वाम पाशे, मृदु मृदु हासे,प्राणनाथ बलि डाके।* *राधार जेमन, मनेर वासना,तेमति करिया थाके।।।* *सोनार केतकी, देखिते मूरति,साधिते मनेर साधा।* *दास वृन्दावन, करे निवेदन,देखिते निताइ राधा।।*

प्रभु कहे नित्यानन्द

प्रभु कहे नित्यानन्द, जग-जीव हैल अन्ध, केह त ना पाइल हरिनाम। एक निवेदन तोरे, नयने देखिबे जारे, कृपा करि लओयाइबे नाम॥ कृत पापी दुराचार, निन्दुक पाषंड आर, केह जेन वंचित ना हय। शमन बलिया भय, जीवे जेन नाहीं रय, सुखे जेन हरिनाम लय॥ कुमति तार्किक जन, पडुआ अधमगन, जन्मे जन्मे भकति विमुख। कृष्ण-प्रेमदान करि, बालक वृद्ध पुरुष नारी, खंडाइह सबाकार दुख॥ संकीर्तन प्रेम-रसे, भासाइया गौड़देशे, पूर्ण कर सबाकार आश। हेन कृपा अवतारे, उद्धार नहिल जारे, की करिबे बलरामदास॥

बहु मिनती

माधव बहुत मिनति करूँ तोय। देड तुलसी तिल देह समर्पिन दया जानि छोड़बि मोय॥ गणइते दोष गुण लेश ना पाओबि जब तुहु करबि विचार। तह जगन्नाथ जगते कहायसि जग बाहिर नह मुञि छार॥ किये मानुष पशु पाखी जे जनमिये अथवा कीट पतंगे। करम विपाके गतागति पुनः पुनः मति रह तया परसंगे॥ भनये विद्यापति अतिशय कातर तरइते इह भवसिंधु। तुया पद पल्लव करि अवलम्बन तिल एक देह दीनबन्धु॥

निताई जीवन धन

"निताइ मोदेर जीवनधन निताइ मोदेर जाति। निताइ बिहने मोदेर आर नाहिं गति।। संसार सुखेर मुखे तुले दिए छाई। नगरे मांगिया खाब गाइये निताई।। जे देशे निताइ नाइ से देशे ना जाब। निताइ बैमुखीर मुख कभु ना हेरिब।। काँधेर पैता जेमन ना छाडे ब्राह्मन। तेमति निताइ मोदेर सरबस धन।। गंगा जार पद जल हर शिरे धरे। हेन निताइ न भजिये दुःख पेये मरे।। ताइ बलि भज भाइ गौरांग निताइ। कलिभव एड़ते आर गति नाई।। -निताइ हमारे जीवनधन और जाति-पाँति सब कुछ हैं। निताइ बिना हमारी गति नहीं। हम संसार सुख के मुख में राख झोंककर नगर-नगर, द्वार-द्वार मांगकर खायेंगे और 'निताइ, निताइ' गाते जायेंगे। जिस देश में निताइ नहीं, वहाँ कभी न जायेंगे। जिनके चरणों का जल शिवजी सिर पर धारण करते हैं ऐसे निताइ को न भजकर लोग वृथा दु:ख से मरते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ निताई गौर का भजन करो। कलिकाल में भव सागर से पार होने का कोई और उपाय नहीं है।