निताई जीवन धन

"निताइ मोदेर जीवनधन निताइ मोदेर जाति।
निताइ बिहने मोदेर आर नाहिं गति।।
संसार सुखेर मुखे तुले दिए छाई।
नगरे मांगिया खाब गाइये निताई।।
जे देशे निताइ नाइ से देशे ना जाब।
निताइ बैमुखीर मुख कभु ना हेरिब।।
काँधेर पैता जेमन ना छाडे ब्राह्मन।
तेमति निताइ मोदेर सरबस धन।।
गंगा जार पद जल हर शिरे धरे।
हेन निताइ न भजिये दुःख पेये मरे।।
ताइ बलि भज भाइ गौरांग निताइ।
कलिभव एड़ते आर गति नाई।।

-निताइ हमारे जीवनधन और जाति-पाँति सब कुछ हैं। निताइ बिना हमारी गति नहीं। हम संसार सुख के मुख में राख झोंककर नगर-नगर, द्वार-द्वार मांगकर खायेंगे और 'निताइ, निताइ' गाते जायेंगे। जिस देश में निताइ नहीं, वहाँ कभी न जायेंगे। जिनके चरणों का जल शिवजी सिर पर धारण करते हैं ऐसे निताइ को न भजकर लोग वृथा दु:ख से मरते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ निताई गौर का भजन करो। कलिकाल में भव सागर से पार होने का कोई और उपाय नहीं है।

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