बहु मिनती

माधव बहुत मिनति करूँ तोय।
देड तुलसी तिल
देह समर्पिन
दया जानि छोड़बि मोय॥
गणइते दोष गुण लेश ना पाओबि
जब तुहु करबि विचार।
तह जगन्नाथ
जगते कहायसि
जग बाहिर नह मुञि छार॥
किये मानुष पशु पाखी जे जनमिये
अथवा कीट पतंगे।
करम विपाके गतागति पुनः पुनः
मति रह तया परसंगे॥
भनये विद्यापति अतिशय कातर
तरइते इह भवसिंधु।
तुया पद पल्लव करि अवलम्बन
तिल एक देह दीनबन्धु॥

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