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मेरे तो गिरधर गोपाल 19- यहाँ शंका हो सकती है कि भगवान् में राजस-तामस भाव कैसे होते हैं? इसका समाधान है कि जैसे घर एक ही होता है, पर उसमें रसोई भी होता है और शौचालय भी अथवा एक ही शरीर शरीर में उत्तमांग भी होते हैं और अधमांग भी, ऐसे ही एक भगवान् में सात्त्विक भाव भी हैं और राजस-तामस भाव भी। संसार को मिथ्या मानकर केवल भगवान को सत्य मानना भी एक पद्धति (साधन-मार्ग) है। पर इस पद्धति में संसार बहुत दूर तक साथ रहता है। कारण कि त्याग करने से त्याज्य वस्तु की सूक्ष्म सत्ता बनी रहती है। इसलिये इस पद्धति में भगवान् से अभेद तो होता है, पर अभिन्नता (आत्मीयता) नहीं होती। परन्तु जो संसार रूप से भगवान् को देखते हैं, वे भगवान् के साथ अभिन्न हो जाते हैं। साधकों की प्रायः यह शिकायत रहती है कि यह जानते हुए भी कि संसार की कोई भी वस्तु अपनी नहीं है, जब कोई वस्तु सामने आती है तो उसका असर पड़ जाता है। इस विषय में दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। एक बात तो यह है कि असर पड़े तो परवाह मत करो अर्थात उसकी उपेक्षा कर दो। न तो उसको अच्छा समझो, न बुरा समझो। न उसके बने रहने की इच्छा करो, न मिटने की इच्छा करो। उससे उदासीन...

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मेरे तो गिरधर गोपाल 18- संसार की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसको जीव ने ही अहंता-ममता-कामना के कारण स्वतन्त्र सत्ता दी है। जब तक साधक में अहंता-ममता-कामना रहती है, तब तक उसको यह मानना चाहिये कि परमात्मा में संसार है और संसार में परमात्मा है। परन्तु जब उसकी अहंता-ममता-कामना मिट जायगी, तब उसकी दृष्टि में न संसार में परमात्मा रहेंगे, न परमात्मा में संसार रहेगा, प्रत्युत परमात्मा-ही-परमात्मा रहेंगे। परमात्मा में संसार को देखना अथवा संसार में परमात्मा को देखना अधूरी आस्तिकता है। परन्तु केवल परमात्मा को ही देखना पूरी आस्तिकता है। भगवान ने कहा है- ‘ममैवांशो जीवलोके’।भगवान का अंश होने के कारण जीव का सम्बन्ध केवल भगवान के साथ है, प्रकृति के साथ बिलकुल नहीं है। इसलिये जड़-चेतन का ठीक-ठीक विवेक करना साधक के लिये बहुत आवश्यक है। साधक को यह जानना चाहिये कि हमारा विभाग ही अलग है। हम चेतन-विभाग में हैं। जड़-विभाग से हमारा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। सम्पूर्ण पदार्थ और क्रियाएँ जड़-विभाग में हैं। चेतन-विभाग में न पदार्थ है, न क्रिया। वास्तव में पदार्थ और क्रिया की सत्ता ही नहीं है। इसलिये साधक को प...

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मेरे तो गिरधर गोपाल 17- गीता भगवान के समग्ररूप को मानती है, उसी को महत्त्व देती है और उसकी प्राप्ति में ही मानव-जीवन पूर्णता मानती है। सब कुछ भगवान ही हैं- ‘वासुदेवः सर्वम्’ -यह भगवान का समग्ररूप है। सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि रूप तथा पदार्थ और क्रियारूप सम्पूर्ण जगत, सम्पूर्ण जीव, सम्पूर्ण जीव, सम्पूर्ण देवता- ये सब-के-सब भगवान के समग्ररुप के अन्तर्गत आ जाते हैं। इसलिये जो समग्र क्को जान लेता है, उसके लिये कुछ भी जानना शेष नहीं रहता- ‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते’।समग्र को जानने का मुख्य साधन है-शरणागति। इसलिये भगवान् ने गीतोपदेश का पर्यवसान शरणागति में ही किया है- ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।’भगवान् ने गीता भर में केवल शरणागति को ही ‘सर्वगुह्यतम’ (सबसे अत्यन्त गोपनीय) कहा है- ‘सर्वगुह्यतमं भूयःश्रृणु’। वास्तव में सत्ता एक ही है। उस एक परमात्मा की सत्ता के अधीन जीव की सत्ता है और जीव के अधीन जगत् की सत्ता है। जीव और जगत्-दोनों परमात्मा में ही भासित होते हैं। गीता के सातवें अध्याय में भगवान ने जीव को अपनी ‘परा प्रकृति’ और जगत्...

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मेरे तो गिरधर गोपाल 16- चाहे मेरे निर्गुण स्वरूप का चित्त से उपासना करने वाला हो अथवा मायिक गुणों से अतीत मेरे सगुण स्वरूप की सेवा-अर्चना करने वाला हो, वह भक्त मेरा ही स्वरूप है। वह सूर्य की भाँति विचरण करता हुआ अपनी चरण-रज के स्पर्श से तीनों लोकों को पवित्र कर देता है।’ तात्पर्य है कि चाहे भक्त हो या ज्ञानी, उसके चरणों के स्पर्श से पृथ्वी पवित्र हो जाती है। जैसे सूर्य जहाँ जाता है, वहाँ प्रकाश हो जाता है, ऐसे ही वह महात्मा जहाँ जाता है, वहाँ प्रकाश हो जाता है, आनन्द हो जाता है। कारण कि उसके भीतर राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि बिलकुल नहीं होते। इसलिये हमारी यही चेष्टा होनी चाहिये कि राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि से पिण्ड छूट जाय। हमारे हृदय में राग-द्वेषादि विकार न रहें। जब तक ये कम न हों, तब तक समझे कि असली सत्संग मिला नहीं है। जब तक मनुष्य में गुण-अवगुण दोनों रहते हैं, तब तक वह साधक नहीं होता। साधक तभी होता है, जब अवगुण मिट जाते हैं। दूसरा उसके साथ वैर करे तो भी उसके हृदय में वैर नहीं होता, उलटे हँसी आती है, प्रसन्नता होती है। वह अनिष्ट-से-अनिष्ट चाहने वाले का भी बुरा नहीं चाहता। कर्मयोग, ज्ञानय...

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मेरे तो गिरधर गोपाल 15- परन्तु सत्संग करते-करते वह क्रोध कम होता है, थोड़ी-सी बात में नहीं आता, जोर से नहीं आता और कम देर ठहरता है। जब छोटी-छोटी कई बातें इकट्ठी हो जाती हैं, तब सहसा किसी बात पर जोर से क्रोध का भभका आता है। परन्तु सत्संग करते-करते वह भी मिट जाता है। क्रोध का स्वरूप है कि जिस पर क्रोध आता है, उसका अनिष्ट चाहता है। सत्संग करते-करते किसी का अनिष्ट करने की चाहना मिट जाती है। सत्संग करने वाले को कभी क्रोध आ जाय तो उसमें होश रहता है और वह नरक देने वाला नहीं होता। काम, क्रोध और लोभ- ये तीनों नरकों के दरवाजे हैं।इनमें फँसे हुए मनुष्य सीधे नरकों में जाते हैं। उनको नरकों में जाने से कोई अटकाने वाला नहीं है। परन्तु सत्संग करने वालों में काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दोष कम हो जाते हैं। वह काम-क्रोधादि के वशीभूत नहीं होता। वह अन्यायपूर्वक, झूठ, कपट, जालसाजी, बेईमानी से धन इकठ्ठा नहीं करता। वह उतना ही लेता है, जितने पर उसका हक लगता है। पराये हक की चीज नहीं लेता। काम-क्रोधादि के वशीभूत होने से अन्याय-मार्ग में प्रवेश हो जाता है, जिसके फलस्वरूप नरकों की प्राप्ति होती है। परन्तु सत्संग करने...

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मेरे तो गिरधर गोपाल 14- कर्मयोग और ज्ञानयोग- ये दोनों साधन हैं और भक्तियोग साध्य है। कई व्यक्ति ऐसा नहीं मानते, प्रत्युत कर्मयोग तथा भक्तियोग को साधन और ज्ञानयोग को साध्य मानते हैं। परन्तु गीता भक्तियोग को ही साध्य मानती है। गीता के अनुसार कर्मयोग और ज्ञानयोग- दोनों निष्ठाएँ समकक्ष हैं, पर भक्ति दोनों से विलक्षण है। कर्मयोग में दो बातें हैं- कर्म और योग। ऐसे ही ज्ञानयोग में भी दो बातें हैं- ज्ञान और योग। परन्तु भक्तियोग में दो बातें नहीं होतीं। हाँ, भक्तियोग के प्रकार दो हैं- साधन-भक्ति और साध्य-भक्ति। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन-यह नौ प्रकार की साधन-भक्ति है और प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमाभक्ति साध्य-भक्ति है- ‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ इसलिये श्रीमद्भागवत में आया है- ‘भक्त्या संञ्जातया भक्त्या’ ‘भक्ति से भक्ति पैदा होती है’ अर्थात् साधन भक्ति से साध्य भक्ति की प्राप्ति होती है। इस तरह साधक चाहे तो आरम्भ से ही भक्ति कर सकता है। भक्ति का आरम्भ कब होता है? जब भगवान् प्य...

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मेरे तो गिरधर गोपाल 13- निष्काम भाव होने से मनुष्य में राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि द्वंदों का नाश हो जाता है और समता आ जाती है। समता आने से योग हो जाता है; क्योंकि योग नाम समता का ही है- ‘समत्वं योग उच्यते’ निष्कामभाव आने से चेतनता की मुख्यता और जड़ता की गौणता हो जाती है। मनुष्य में जितना-जितना निष्काम भाव आता है, उतना-उतना वह संसार से ऊँचा उठता है और जितना-जितना सकाम भाव आता है, उतना-उतना वह संसार में बँधता है। गीता में आया है- इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्माणि ते स्थिताः (गीता 5। 19) जिनका मन साम्यावस्था में स्थित हो गया, उन लोगों ने संसार को जीत लिया अर्थात वे जन्म-मरण से ऊँचे उठ गये। ब्रह्म निर्दोष और सम है और उनका अन्तःकरण भी निर्दोष और सम हो गया, इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हो गये। वास्तव में परमात्मा में स्थिति सबकी है; क्योंकि परमात्मा सर्वव्यापक हैं। एक सुई की नोक-जितनी जगह भी परमात्मा से खाली नहीं है। परमात्मा सब जगह-समान रूप से परिपूर्ण हैं। परन्तु परमात्मा में स्थित होते हुए भी संसार में राग-द्वेष के कारण मनुष्य परमात्मा में ...