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झंकार यशजु

मेरी साँसों में महकती उनकी साँसों की वो घुलती मिठास का महकता एहसास आज भी याद है। उनकी श्री अंग की कांति से खिलती किरणों की रोशनी से बहती हवाओ में बिखरी उनकी शीतल मदहोश करती उनकी महक आज भी याद है। काले घटा से भी कारी उनकी भीगी हुए केश रोम कूपों से रिश्ता वो स्वेद जैसे सावन में झूमती बदरा का झूम के बारिश की बूंदों के साथ इठलियाँ करना। मेरी सांसो की झंकार हो तुम मेरा सोलह श्रृंगार हो तुम मेरी आँखों का इन्तेजार हो तुम मेरा ईमान मेरी शान मेरा मान हो तुम थोड़े बेईमान हो तुम, थोड़े नादान हो तुम थोड़े शैतान हो तुम। हाँ मगर ये सच है मेरे भगवान हो तुम।। मेरे बस मेरे गौर

भाव यशजु

भाव!!! क्या है यह भाव, क्या छुपा है इस शब्द में, क्यों इस शब्द की भक्ति मार्ग के इतनी महत्ता है??? भाव वैसे तो अनेक प्रकार का होता है परंतु निर्भर करता है कि यह किसका और कबका है। निज भाव दुसरो पर व्यक्त करना कोरी मूर्खता के सिवा कुछ नही। निज भाव निज ही होता है जो ईस्ट देव कृपा से सुलभ होता है। किसी के भाव मे प्रवेश कर उसके संग रहा तो जा सकता किन्तु उस भाव मे जीया नही जा सकता। उस भाव मे तो उसका जीना तभी संभव जब उड़ भाव की कृपा जीव पर पूर्ण रूप से हो। भाव जब तक पूर्ण न होता तब तक वो सिद्ध नही होता और बिना सिद्ध हुए भाव के लीला आस्वादन प्राप्ति असंभव है। लीला का आस्वादन मुख्य रूप से भाव पर ही निर्भर करता है।  हमारे निज भाव को संसार भर ने सुना है कुछ ने रूपांतरण भी किया है कुछ ने इसको अपनाया भी है तो कुछ ने इसको मार्ग बना कर प्रेम प्राप्ति का साधन भी बनाया है, किन्तु सत्यता तो यह है कि बिना हमारी इच्छा के हमारे इस भाव को कोई भी जी नही  सकता, यह हमरा निज भाव है इसको समझना एक पल को आसान हो भी सकता किन्तु इसमें जीना खो जाना सिर्फ हमको ही प्राप्त है जिसके दुबारा रसास्वादन हेतु हमको भाव...

नाम जप

बड़े से बड़े शुभकर्म में भी इतनी सामर्थ्य नही की वह हमें प्रभु की प्राप्ति करा सके। प्रभु की प्राप्ति कराने में उनका नाम ही समर्थ है। जिनको भी हम महापुरुष मानते है ऐसे जिन भी सन्त से अगर उनके हृदय की बात पूछो तो वे एकमात्र नाम जपने को कहते है क्योकि उनका काम भी नाम से ही बना है। इसलिए *सबका सार है निरन्तर नामजप करना*। और कोई साधन बने तो ठीक है, न बने तो आवश्यक नही है। *एकमात्र नाम जप से ही सब काम बन जायेगा*। नाम जप करोगे तो इष्ट की सेवा हो जाएगी। नामजप करोगे तो जहाँ आप सोच भी नही सकते हो उस प्रेम देश मे आपका प्रवेश हो जाएगा।  जब तक नामजप नही होगा तब तक इस माया पर विजय प्राप्त नही होगी औऱ यदि नामजप हो रहा है तो डरने की जरूरत नही है। वह नाम अपने प्रभाव से समस्त वासनाओं को नष्ट कर देगा। आप निरन्तर नामजप में लगे रहिए। जब नाम का प्रभाव हृदय में उदय होगा तो आपको ऐसा बल ऐसा ज्ञान कि आप माया में फँसेंगे ही नही *अतः आप एक एक क्षण नामजप में लगावें , सब शास्त्रों एवं समस्त सिद्धान्तों की ये सार बात है।।* *रसिक सन्त परम पूज्य*  *श्रीहित प्रेमानन्द गोविंद शरण जी महाराज*

यशु

हमारा पागलपन की हद्द तो देखो, उनको उनसे है छीनने के सपने देखने लगे अब हम। प्रेम आता ही कहाँ बस आपको देखते रहे उस पर ही दो जहाँ कुर्बान तुमको पाना चाहता ये दिल तुझमे खो जाना चाहता ये दिल।  बस हर पल तुझको ही पाना चाहता ये दिल। मेरे ख्यालों में मिलना एक दिन। न चाहिए कुछ तुमसे ज्यादा न तुमसे कम नही। तुमसे दूर जाने का खयाल भी हमारी सांसे बंद करने लगता क्यों क्यों आखिर क्यों तुमको महसूस करते ही ये जुबां रुकती नही थकती नही  बस तुमको तकती सदा सदा बस सदा तू जो रूठा तो कौन हंसेगा तू जो छुटा तो कौंन रहेगा, तू चुप है तो ये डर लगता है अपना मुझको अब कौन कहेगा तू ही वजह तेरे बिना बेकार हुँ मैं। उम्र भर जिसको पा न सके उसकी याद में तड़पना तो हमारा नसीब बन गया बस उसकी बस उसकी ही हर याद है किस्सा कहानी बन गया। तैयार हूं मैं तुमसे मिली हर एक चीज़ हमे अपनी लगती अब वो बिरह हो या प्रेम

नित्यानन्द चालीसा

नित्यानन्द प्रभु चालीसा नित्यानन्द प्रभु चालीसा ****************** जय बलराम अभिन्न निताई । जय जान्हवा पतिहि प्रभुराई ।।1।। जय जय सेवक विग्रह रूपा। सेव्य गौर को दास अनूपा।। 2।। जय जय नित्य गौर कउ संगी। सेवहि गौरहु नाना रँगी।।3।। गौर कृष्ण अवतरिन मूला । आदि पुरसु  विस्तारी खेला।।4।। स्वयं रूप असि बेद बखाने। सोहि अभिन्न स्वांश उपजाने।।5।। प्रथम अभिन्न रूप बलरामा। सेवक सेव्य एक भगवाना।।6।। नाम रूप को भेद द्विरूपा। अन्यथा एकु तत्व अनूपा।।7।। रूप विखंडित कबहुँ न ह्वै हैं। सचिदानन्द बेद कहहि हैं।। 8।। नित्यानन्द विविध कर रूपा। प्रकटहि रूप अनन्त अनूपा ।।9।। धाम सिंघासन पद कउ चौकी।मुकुट ब्रिछ उपकरण अनेकी।।10।। सोहि राम निज रूप कु लेव्हि। सोहि राम प्रभजु के सेवहि।।11।। सोहि प्रथम चतुर्व्यूह रूपा । करें विस्तार बहु विधि रूपा ।। 12।। पुनि हरि कोटि चतुर्भुज रूपा।सजहिं बैकुंठ दिव्य अनूपा ।।13।। द्वितीय चतुर्भुज सोहि रचहि । सबहि रूप ते हरि के सेवहि।।14।। तिनिते प्रथम पुरसु अवतारा। कारन जलनिधि कीन्ह पसारा।।15।। कोटि कोटि ब्रह्मांड अपारा।सोही राम छिद्र उपजारा।।16।। दूसरू पुरसु सबे ब्रह्मंडा। गर्भोध...

स्त्रोतम

🌹 *पूज्यपाद श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कृत स्त्रोत* 🌹 *विगलित-नयन-कमल-जलधारं भूषण - नवरस - भावविकारम्।* *गति - अतिमन्थर - नृत्यविलासंतं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम्।।* *चंचल-चारु-चरण-गति-रुचिरं* *मंजीर-रंजत-पदयुग-मधुरम्।* *चन्द्र - विनिन्दित - शीतलवदनं तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम्।।* *घृत-कटि-डोर-कमण्डलु-दण्डं दिव्य कलेवर-मुण्डित-मुण्डम्।* *दुर्जन - कल्मष - खण्डन - दण्डं तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम्।।* *भूषण - भूरज - अलका - वलितं कम्पित-बिम्बाधरवर-रुचिरम्।* *मलयज-विरचित-उज्ज्वल-तिलकं तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम्।।*   🌹 *जिनके नयन-कमलोंसे निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित होती रहती है, नवरस भाव-विकार जिनके श्रीअंगोंके भूषण-स्वरूप हैं और नृत्य-विलास हेतु जिनकी गति अति मन्थर है, उन शचीनन्दन  श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ।।*   🌹 *जिनके नूपुर-शोभित श्रीचरण-यगुलकी गति अतिशय मनोहर है, उन चन्द्र-विनिन्दित सुशीतल वदन विशिष्ट शचीनन्दन श्रीगौर हरिको प्रणाम करता हूँ।।* 🌹 *जिन्होंने कटितट में (कमर में) डोर-बहिर्वास एवं हाथ में दण्ड कमण्डल धारण कर रखा है, मुण्डन किया हुआ अति भव्य जिनका मस्तक है, जो अति...

48

मेरे तो गिरधर गोपाल 48- आपके ऐसे मृदुल स्वभाव को सुनकर ही आपके सामने आने की हिम्मत होती है। अगर अपनी तरफ देखें तो आपके सामने आने की हिम्मत नहीं होती। आपने वृत्रासुर, प्रह्लाद, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, व्रज की गोपियाँ आदि का भी उद्धार कर दिया, यह देखकर हमारी हिम्मत होती है कि आप हमारा भी उद्धार करेंगे।जैसे अत्यन्त लोभी आदमी कूडे़-कचडे़ में पडे़ पैसे को भी उठा लेता है, ऐसे ही आप भी कूडे़-कचडे़ में पडे़ हम-जैसों को उठा लेते हो। थोड़ी बात से ही आप रीझ जाते हो।-‘तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें’।कारण कि आपका स्वभाव है- रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की। अगर आपका ऐसा स्वभाव न हो तो हम आपके नजदीक भी न आ सकें; नजदीक आने की हिम्मत भी न हो सके! आप हमारे अवगुणों की तरफ देखते ही नहीं। थोड़ा भी गुण हो तो आप उस तरफ देखते हो। वह थोड़ा भी आपकी दृष्टि से है। हे नाथ! हम विचार करें तो हमारे में राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह अभिमान आदि कितने ही दोष भरे पड़े हैं। हमारे से आप ज्यादा जानते हो, पर जानते हुए भी आप उनको मानते नहीं- ‘जन अवगुन प्रभु...