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यशु

हमारा पागलपन की हद्द तो देखो, उनको उनसे है छीनने के सपने देखने लगे अब हम। प्रेम आता ही कहाँ बस आपको देखते रहे उस पर ही दो जहाँ कुर्बान तुमको पाना चाहता ये दिल तुझमे खो जाना चाहता ये दिल।  बस हर पल तुझको ही पाना चाहता ये दिल। मेरे ख्यालों में मिलना एक दिन। न चाहिए कुछ तुमसे ज्यादा न तुमसे कम नही। तुमसे दूर जाने का खयाल भी हमारी सांसे बंद करने लगता क्यों क्यों आखिर क्यों तुमको महसूस करते ही ये जुबां रुकती नही थकती नही  बस तुमको तकती सदा सदा बस सदा तू जो रूठा तो कौन हंसेगा तू जो छुटा तो कौंन रहेगा, तू चुप है तो ये डर लगता है अपना मुझको अब कौन कहेगा तू ही वजह तेरे बिना बेकार हुँ मैं। उम्र भर जिसको पा न सके उसकी याद में तड़पना तो हमारा नसीब बन गया बस उसकी बस उसकी ही हर याद है किस्सा कहानी बन गया। तैयार हूं मैं तुमसे मिली हर एक चीज़ हमे अपनी लगती अब वो बिरह हो या प्रेम

नित्यानन्द चालीसा

नित्यानन्द प्रभु चालीसा नित्यानन्द प्रभु चालीसा ****************** जय बलराम अभिन्न निताई । जय जान्हवा पतिहि प्रभुराई ।।1।। जय जय सेवक विग्रह रूपा। सेव्य गौर को दास अनूपा।। 2।। जय जय नित्य गौर कउ संगी। सेवहि गौरहु नाना रँगी।।3।। गौर कृष्ण अवतरिन मूला । आदि पुरसु  विस्तारी खेला।।4।। स्वयं रूप असि बेद बखाने। सोहि अभिन्न स्वांश उपजाने।।5।। प्रथम अभिन्न रूप बलरामा। सेवक सेव्य एक भगवाना।।6।। नाम रूप को भेद द्विरूपा। अन्यथा एकु तत्व अनूपा।।7।। रूप विखंडित कबहुँ न ह्वै हैं। सचिदानन्द बेद कहहि हैं।। 8।। नित्यानन्द विविध कर रूपा। प्रकटहि रूप अनन्त अनूपा ।।9।। धाम सिंघासन पद कउ चौकी।मुकुट ब्रिछ उपकरण अनेकी।।10।। सोहि राम निज रूप कु लेव्हि। सोहि राम प्रभजु के सेवहि।।11।। सोहि प्रथम चतुर्व्यूह रूपा । करें विस्तार बहु विधि रूपा ।। 12।। पुनि हरि कोटि चतुर्भुज रूपा।सजहिं बैकुंठ दिव्य अनूपा ।।13।। द्वितीय चतुर्भुज सोहि रचहि । सबहि रूप ते हरि के सेवहि।।14।। तिनिते प्रथम पुरसु अवतारा। कारन जलनिधि कीन्ह पसारा।।15।। कोटि कोटि ब्रह्मांड अपारा।सोही राम छिद्र उपजारा।।16।। दूसरू पुरसु सबे ब्रह्मंडा। गर्भोध...

स्त्रोतम

🌹 *पूज्यपाद श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कृत स्त्रोत* 🌹 *विगलित-नयन-कमल-जलधारं भूषण - नवरस - भावविकारम्।* *गति - अतिमन्थर - नृत्यविलासंतं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम्।।* *चंचल-चारु-चरण-गति-रुचिरं* *मंजीर-रंजत-पदयुग-मधुरम्।* *चन्द्र - विनिन्दित - शीतलवदनं तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम्।।* *घृत-कटि-डोर-कमण्डलु-दण्डं दिव्य कलेवर-मुण्डित-मुण्डम्।* *दुर्जन - कल्मष - खण्डन - दण्डं तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम्।।* *भूषण - भूरज - अलका - वलितं कम्पित-बिम्बाधरवर-रुचिरम्।* *मलयज-विरचित-उज्ज्वल-तिलकं तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम्।।*   🌹 *जिनके नयन-कमलोंसे निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित होती रहती है, नवरस भाव-विकार जिनके श्रीअंगोंके भूषण-स्वरूप हैं और नृत्य-विलास हेतु जिनकी गति अति मन्थर है, उन शचीनन्दन  श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ।।*   🌹 *जिनके नूपुर-शोभित श्रीचरण-यगुलकी गति अतिशय मनोहर है, उन चन्द्र-विनिन्दित सुशीतल वदन विशिष्ट शचीनन्दन श्रीगौर हरिको प्रणाम करता हूँ।।* 🌹 *जिन्होंने कटितट में (कमर में) डोर-बहिर्वास एवं हाथ में दण्ड कमण्डल धारण कर रखा है, मुण्डन किया हुआ अति भव्य जिनका मस्तक है, जो अति...

48

मेरे तो गिरधर गोपाल 48- आपके ऐसे मृदुल स्वभाव को सुनकर ही आपके सामने आने की हिम्मत होती है। अगर अपनी तरफ देखें तो आपके सामने आने की हिम्मत नहीं होती। आपने वृत्रासुर, प्रह्लाद, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, व्रज की गोपियाँ आदि का भी उद्धार कर दिया, यह देखकर हमारी हिम्मत होती है कि आप हमारा भी उद्धार करेंगे।जैसे अत्यन्त लोभी आदमी कूडे़-कचडे़ में पडे़ पैसे को भी उठा लेता है, ऐसे ही आप भी कूडे़-कचडे़ में पडे़ हम-जैसों को उठा लेते हो। थोड़ी बात से ही आप रीझ जाते हो।-‘तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें’।कारण कि आपका स्वभाव है- रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की। अगर आपका ऐसा स्वभाव न हो तो हम आपके नजदीक भी न आ सकें; नजदीक आने की हिम्मत भी न हो सके! आप हमारे अवगुणों की तरफ देखते ही नहीं। थोड़ा भी गुण हो तो आप उस तरफ देखते हो। वह थोड़ा भी आपकी दृष्टि से है। हे नाथ! हम विचार करें तो हमारे में राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह अभिमान आदि कितने ही दोष भरे पड़े हैं। हमारे से आप ज्यादा जानते हो, पर जानते हुए भी आप उनको मानते नहीं- ‘जन अवगुन प्रभु...

47

मेरे तो गिरधर गोपाल 47- अभिन्नता दो होते हुए भी हो सकती है; जैसे बालक की माँसे, सेवक की स्वामी से, पत्नी की पति से अथवा मित्र की मित्र से अभिन्नता होती है। इसलिये भक्ति में आरम्भ से ही भक्त की भगवान् से अभिन्नता हो जाती है-‘साह ही को गोतु गोतु होती है गुलाम को’।कारण कि भक्त अपना अलग अस्तित्व नहीं मानता। उसमें यह भाव रहता है कि भगवान् ही हैं, मैं हूँ ही नहीं। प्रेम में माधुर्य है। अतः ‘प्रभु मेरे हैं’ ऐसे अपना पन होने से भक्त भगवान् का ऐश्वर्य (प्रभाव) भूल जाता है। जैसे, महारानी का बालक उसको ‘माँ मेरी है’ ऐसे मानता है तो उसका प्रभाव भूल जाता है कि यह महारानी है। एक बाबा जी ने गोपियों से कहा कि कृष्ण बड़े ऐश्वर्यशाली हैं, उनके पास ऐश्वर्य का बड़ा खजाना है, तो गोपियाँ बोलीं कि महाराज! उस खजाने की चाबी तो हमारे पास है! कन्हैया के पास क्या है? उसके पास तो कुछ भी नहीं! तात्पर्य है कि माधुर्य में ऐश्वर्य की विस्मृति हो जाती है। संसार में तो ऐश्वर्य का ही ज्यादा आदर है, पर भगवान् में माधुर्य का ज्यादा आदर है। जिस समय भगवान् में माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है, उस समय ऐश्वर्य-शक्ति दूर भाग जाती है,...

46

मेरे तो गिरधर गोपाल 46- अनन्तरस को प्रवाहित करने वाली प्रेम रूपी नदी के दो तट हैं- नित्यमिलन और नित्यविरह। नित्यमिलन से प्रेम में चेतना आती है, विशेष विलक्षणता आती है, प्रेम का उछाल आता है और नित्यविरह से प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है अर्थात् अपने में प्रेम की कमी मालूम देने पर ‘प्रेम और बूढ़े, और बूढ़े’ यह उत्कण्ठा होती है। अरबरात मिलिबे को निसिदिन, मिलेइ रहत मनु कबहुँ मिलै ना। जैसे धनी आदमी में तीन चीजें रहती हैं-1. धन और 2. धन का नशा अर्थात् अभिमान और 3. धन बढ़ने की इच्छा। ऐसे ही प्रेमी में तीन चीजें रहती हैं- 1. प्रेम 2. प्रेम की मादकता, मस्ती और 3. प्रेम बढ़ने की इच्छा। धनी आदमी में जो ‘धन और बढ़े, और बढ़े’- यह इच्छा रहती है, वह लोभरूपी दोष के बढ़ने से होती है। परन्तु प्रेमी में जो ‘प्रेम और बूढ़े, और बढ़े’- यह इच्छा रहती है, वह अहंता-ममता रूपी दोषों के मिटने से होती है।अहंता-ममता रूपी दोषों के मिटने के बाद जहाँ अहंता (मैं-पन) थी, वहाँ ‘नित्यमिलन’ प्रकट होता है और जहाँ ममता (मेरा-पन) थी, वहाँ ‘नित्यविरह’ प्रकट होता है वास्तव में नित्यमिलन (नित्ययोग) और नित्यविरह-दोनों जीव में सद...

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मेरे तो गिरधर गोपाल 45- भगवान् का मिलन और विरह दोनों ही नित्य हैं, अनिर्वचनीय हैं, दिव्य हैं, जिनसे प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है। मिलन में प्रेम को अपने में प्रेम की कमी मालूम देती है कि जैसे भगवान् हैं, वैसा (भगवान् के लायक) मेरे में प्रेम नहीं है; और विरह में प्रेम को कभी प्रेमास्पद की विस्मृति नहीं होती, प्रत्युत निरन्तर स्मृति (तल्लीनता) बनी रहती है। यह मिलन और विहर-दोनों भगवान् देते हैं और दोनों भगवत्स्वरूप ही होते हैं। वे ‘विरह’ इसलिये देते हैं कि भक्त अपने में प्रेम की कमी का अनुभव करे और कमी का अनुभव होने से प्रेम बढ़े। वे ‘मिलन’ इसलिये देते हैं कि भक्त प्रेम का अनुभव करे, आस्वादन करे। भक्त का भगवान् में दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य आदि कोई भी भाव हो, भक्त की अपनी अलग सत्ता नहीं होती; क्योंकि प्रेम में भक्त और भगवान् एक होकर दो होते हैं और दो होकर भी एक रहते हैं। इसलिये प्रेमी और प्रेमास्पद-दोनों में कभी सेवक स्वामी हो जाता है, कभी स्वामी सेवक हो जाता है। शंकर जी के लिये कहा भी है- ‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’।दक्षिण भारत में एक मन्दिर है, जिसमें शंकर जी ने नन्दी को उठा रखा...