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🌹💙 *सखियों के श्याम* 💙🌹  🌹*कहा करूँ कित जाऊँ सखी री* 🌹  *(28)*  एक पर्णकूटी, यमुनातट से हटकर वृक्ष समूह से आवृत-सी। उसमें बाँस की खपच्चियों से बना केवल एक ही वातायन छोटा-सा । यह अपराह्न से ही वातायन से सिर टिकाकर खड़ी हो जाती। संध्यापूर्व से ही प्रतिचि गोरज मंडित हो जाती और धीरे-धीरे वह प्राणहारी वंशी रव मन प्राण देह को झनझना देता है- उसके प्राण नेत्रों में आ समाते। गौरजघन-पटल पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता, तब उसमें स्थिर विद्युत सी आभुषणों की चमक काँधने लगती। कुछ क्षण ही कुछ ही क्षण, पर वे कुछ क्षण कैसे कठिन; प्रतिक्षा के अंत का उत्साह, उत्सुकता, आवेग तीव्र अभिप्सा बनकर, प्राणघातक हो रोम-रोम में व्याप्त हो जाती। वातायन की ताड़ियों से टिका सिर, फटे-फटे नेत्र, दोनों हाथों से वातायन की छड़ियों को दृढ़ता पूर्वक थामें वह थरथर काँपती देह को सम्हालने का यत्न करती.... । आह! कितना कठिन है यह देह को सम्हालना..... और तब.... तब जैसे प्राची की कोख से अंशुमाली उदित हुए हों... वह घनश्याम वपु अपनी मंद-मधुर-मादक गति से आगे बढ़ता दृष्टिगोचर होता – देह त्यागकर सम्मुख दौड़ जाने को आतुर ...

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🌹💙 *सखियों के श्याम* 💙🌹  *(25)* 🌹 *अब नहीं जात सह्यो* 🌹 'बहिन राधा ! तनिक धैर्य धरो, यह थोड़ा-सा दूध पी लो । यों कैसे चलेगा; अपनी ओर न सही, अपनी इन बहिनों और सखियोंकी ओर देखो, जिनकी एकमात्र तुम्हीं अवलम्ब हो । '🌹 'जीजी!'–कहते हुए किशोरीजी चन्द्रावली से लिपट गयीं।💙 'जानती हूँ बहिन! किंतु धैर्य धारण कर मुख नहीं जुठारोगी, तो इन सबके मुख में जल भी न जा पायेगा। वह निर्दयी व्रज का आनन्द ले गया, पर तुम्हारे साथ तो व्रज का जीवन बँधा है बहिन! तनिक धैर्य धारण करो।'🌹 'जीजी पहले तुम पियो ! इन सखियों को दो।' 🌹 'नहीं राधा ! पहले तुम्हें ही लेना होगा! यह देखो सब तुम्हारा मुख देख रही हैं। तुम्हारे पश्चात इन्हें मनाना सहज होगा, अन्यथा तुमसे पूर्व इनके होठों से आगे कोई खाद्य पदार्थ नहीं पहुँचेगा।'🌹 'तो पहले तुम जीजी।' "अच्छा बहिन; यही सही! वज्र हृदया चन्द्रा ही आरम्भ करेगी। व्रजमें वही तो एक बची है खाने-पहनने को - चन्द्रवली ने कटोरा मुख से लगाकर दो घूँट भर लिये, बरसने को आतुर आँसुओं को मुख फेरकर पोंछ दिया। 🌹 भूमिपर पड़ी भानुनन्दिनी को हाथ ...

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🌹💙 *सखियों के श्याम* 💙🌹  *(24* )  🌹 *प्रीत किये दुख होत* 🌹 यह मैं कहाँ आ गयी? आह! पद स्वतः इस ओर चल पड़ते हैं। अभागे मन! तू समझता क्यों नहीं है कि अब यहाँ कुछ नहीं है, कुछ भी नहीं सम्भवतः वह स्वप्न था, एक मधुर स्वप्न! प्रातः हुई और टूट गया वहीं, अब उसके लिये विक्षिप्त होनेसे क्या होगा? स्वप्नके सहारे जीनेमें कौन-सी बुद्धिमानी है ? किंतु .... किंतु.... क्या वह सचमुच स्वप्न था? स्वप्न यदि असत्य ही हो, तो फिर मथुरामें कंसका वध और सबकी वहाँ उपस्थिति सत्य क्यों है ? नहीं वह सब सत्य ही था, स्वप्न नहीं! श्यामसुन्दर भली करी तुमने ! इसी दिनके लिये तुमने कालीय, दावानल, अरीष्ट और केशीसे बचाया था? इसीलिये हमारे साथ हेल-मेल बढ़ाया, प्रीतकी फाँसी डाल इस व्रजको तड़पनेका दंड किसलिये श्याम ? वह साँकरी खोर, वह यमुनातट, यह रासस्थली रुदनकर रही है। रो रही है शत- सहस्त्रश: गोपकुमारिकायें, और जलविहीन मत्स्यकी भाँति तड़प रही हैं। श्रीकिर्तिकिशोरी, नन्दराय और यशोदारानीकी व्यथा कही जाने योग्य नहीं है ! तुम जो एक गोवत्सका रंभाना सुन उठ भागते थे; आज ऐसे निष्ठुर कैसे हो उठे कि एकबारगी ही उसे भुला बै...

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🌹💙 सखियों के श्याम 💙🌹  *(23)*  *अकथ कथा*  'इला कहाँ है काकी! दो दिनसे नहीं देखा उसे, रुग्ण है क्या ?' 'ऊपर अटारी में सोयी है बेटी! जाने कहाँ भयो है, न पहले सी खावे खेले, न बतरावै। तू ही जाकर पूछ लाली। मुझे तो कुछ बताती ही नहीं।' मैंने लेटे-लेटे ही मैया और श्रियाकी बात सुनी। श्रिया मेरी एक मात्र बाल सखी है। यों तो मैया-बाबाकी एकलौती संतान होनेके कारण अकेली ही खेलने-खानेकी आदी रही हूँ, किंतु श्रियाको मेरा और मुझे उसका साथ प्रिय लगता है। यदि एक-दो दिन भी हम आपसमें न मिले, तो उसे जाने कितनी असुविधा होने लगती है कि साँझ-सबेरा कुछ नहीं देखती, भाग आती है घरसे मेरे पास। सीढ़ियाँ चढ़कर वह मेरे पास आयी और पलंगपर ही बैठ गयी। मेरी पीठपर हाथ धरकर बोली- 'क्या हुआ तुझे ? ज्वर है क्या ?' हाथ और ललाट छूकर बोली- 'नहीं ज्वर तो नहीं है, फिर क्या बात है? लेटी क्यों है भला तू? यमुनातट, टेढ़ा-तमाल, वंशीवट सभी स्थान देख लियो! कितने दिनसे नहीं मिली तू? अरे जानती है; कल जल भरनेको कलशी लेकर माधवी जलमें उतरी तो पता नहीं कहाँसे आकर श्यामसुन्दरने भीतर ही भीतर उसका पाँव खींच लिया। वह ...

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🌹💙 *सखियों के श्याम* 💙🌹  *(22)* 🌹 *जात न पूछे कोय* 🌹 यह कौन है; ऐसे वटवृक्षकी जटाओंमें लटकी हुई ? गोपी! नहीं, यह तो कोई शबर कन्या है। कहीं फाँसी तो नहीं लगा ली ? 'कौन हो सखी! ऐसे क्यों लटकी पड़ी हो ?'🌹 मेरी बात सुन वह कृष्ण-वर्णा शबर कन्या चौंककर खड़ी हो गयी। कुछ समय एकान्त पानेके उद्देश्य से इस सघन वटकी ओर चली आयी थी। इसकी जटाओंने भूमिमें पैर गाड़ गाड़कर अनेक स्तम्भ निर्मित कर लिये हैं। और ऊपर सघन वट-पत्रों का वितान-सा तन गया है। मूल वृक्षके नीचे तो अंधेरा रहता है। वही एक पाहन मानो राजसिंहासनकी भाँति रखा है। कभी कभी मैं वहाँकी भूमि स्वच्छ करके इस पाहनपर आ बैठती हूँ।🌹  सर्वप्रथम यहीं श्यामसुंदरसे वार्तालाप हुआ था मेरा ।💙 एक दिन ऐसे ही बैठी मनोरथोंके महल बुन रही थी- 'कभी श्यामसुंदर अपने मुखसे मेरा नाम पुकारेंगे? कभी अपना कोई काम करनेको कहेंगे? कभी उनका स्पर्श प्राप्त होगा? कभी वे हँसकर कोई बात ..... ?'☺️💙 उसी समय किसीने मेरी आँखें बंद कर ली, मैं कुछ झुंझलाई भी और लजाई भी कि मेरे इस एकान्त स्थलका ज्ञान किसी और को हो गया। मैंने ग्लानी भरे स्वरमें कहा–'छोड़ सख...

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🌹💙 *सखियों के श्याम* 💙🌹  *(21)*  🌹 *महधन ब्रजरस पावन* 🌹 'तुझसे यह सब किसने कहा बहिन ?' 'क्यों? कई बहिनोंके मुखसे अनेक बार सुना कि ऋचा भूत भविष्य बता सकती है।' 'तो तुम्हारा ही विगत जानने की उत्सुकता हो आई।'– मैंने हँसकर कहा☺️ 'क्या कुछ अनुचित कहा ?' 'नहीं इला! परन्तु विगत जानकर क्या करोगी? इतना सुन्दर सुरभित - सुघड़ वर्तमान हमारे सामने है, उसे छोड़ भूत-भविष्य की चिंता में क्यों पड़ें!'🌹  'वर्तमान को छोड़ने अथवा उपेक्षित करने के आशय से नहीं, यह उत्सुकतावश पूछा था मैंने, यदि उचित न समझो तो रहने दो।' ' नहीं बहिन! इसमें अनुचित कुछ नहीं है। किन्तु कहाँसे आरम्भ करूँ, यही सोच रही हूँ !'-  कहकर ऋचा कुछ क्षणके लिये चुप हो गयी। 'जिसे तुम हम विद्याके नामसे जानती हैं बहिन! वे भगवती ब्रह्मविद्या है।' ऋचाने मेरी ओर देखा। उसका नाम पहले ब्रह्मविद्या था ? " मैंने सरलतासे पूछा- 'मैं तो तेरा विगत पूछ रही हूँ बहिन!' 'अपना विगत ही कह रही हूँ इला! ये विद्या ही वेदोक्त ब्रह्मविद्या हैं । जिन्हें प्राप्त करनेको पता नहीं कितन...

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*🌹💙सखियों के श्याम💙🌹*  *(20)*   *🌹अनाम अनुभूति🌹*  कौन है यह ? कहाँसे इस पथपर कहाँ जानेके लिये कब आयी थी और अब दिग्भ्रमित सी रह-रहकर चारों ओर दृष्टि पसारकर किसे खोज रही है? कभी अधीर हो इस दिशा और कभी उस दिशाकी ओर दौड़ पड़ती है। कभी आत्महारा-सी बैठती अथवा गिर पड़ती है। सम्भवतः वह स्वयं नहीं जानती कि क्या कर रही है। उसे तो केवल इतना स्मरण है कि — ' क्षण मात्रमें उसके जीवनमें प्रलय घटित हो गया, कैसे भला ?  उसके स्मृति पटलपर केवल दो आकर्ण-चुम्बित कारे-कजरारे दीर्घ दृग हैं। उसके आगे-आगे चलनेवाले किशोरने मुड़कर उसकी ओर देखा; और बस थम गयी सृष्टि  आह! क्या था उस दृष्टिमें कि क्षण मात्रमें उसके सुखी संसारमें प्रलय उपस्थित हो गया ?"🌹 आशा, अभिलाषा, हँसी-खुशीको निर्दयता पूर्वक मिटाकर हृदयमें उतार दी गहरी पीड़ा भरी कसक, जो न जीने देती है और न मरनेका ही अवकाश प्रदान करती है। उस दृष्टिके आघात; हाँ आघात ही तो कहना होगा। यद्यपि इस आघातकी अनुभूति इतनी सरस स्निग्ध, कि सम्भवतः सृष्टिको सम्पूर्ण कोमल अनुभूतियाँ इसकी समतामें हार जाय !🌹 हाँ, तो उस दृष्टिके आघातसे घायल वह भ...