रथ यात्रा 2

*रथ यात्रा लीला 2*

    श्री मनमहाप्रभु जी भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन कर रहे हैं,राय रामानंद जी बोले महाप्रभु जी आप ने सुबह का कुछ खाया भी नहीं है और रात भी हो गई है ,और कल रथ यात्रा भी है चलो ना महाप्रभु जी ।महाप्रभु बोले कुछ देर और मुझे अपने प्राण नाथ को देखने दो ना , आज तो महाप्रभु जी बहुत भोर में  उठ गये ,नरेंदर सरोवर स्नान कर सब भक्तों के साथ मन्दिर चले हैं,अब तो जगन्नाथ जी को लाने की तैयारी चल रही है ,लेकिन जगन्नाथ जी आज भी अपनी मर्ज़ी से चलते हैं ,आज भी रथ यात्रा मे किसी पण्डेय पुजारी से पूछौ की रथ कब चलेगा,क्या समय है रथ चलने का ,तो पुजारी यही बोलते हैं ,"कालिया जाने" ।मन्दिर से ले कर रथ तक गद्दे बिछाये जाते है ,और बाहर तीन रथ आ कर खडे हो जाते हैं ,जो कुछ महीने पहले ही बनने शुरु हो जाते हैं,इतने बड़े बड़े रथ आप हम सब ने दर्शन किया होगा ,बहुत आश्चर्य की बात है इन  रथों को बनाने में एक भी कील का प्रयोग नही किया जाता,
अब तीनों रथ तैयार मन्दिर के बाहर खडे हो गये।

   एक रथ जगन्नाथ जी का है ,जिस रथ का नाम  *नंदी  घोष*  है ,एक रथ सुभद्रा जी  का है ,जिस रथ का नाम *दरप दलन* है ,एक रथ बलदेव जी का है जिस का नाम *ताल ध्वज* है ,जिस रास्ते पर  ये रथ चलते है उस को *बड़ दांग* यानी बड़ा रस्ता कहा जाता है , सब से पहले सुदर्शन जी और सुभद्रा जी मन्दिर से बाहर  आते हैं ,फिर बलदेव जी और जगन्नाथ जी आते हैं ,बलदेव जी और जगन्नाथ जी के आने की छटा ही अनोखी है,उन की कमर पर रेशम की डोरी बाँधी जाती है ,भक्त जन इन को खींच कर लाते हैं ,जगन्नाथ जी और बलदेव जी हिलते हिलते आते हैं ,जो नीचे गद्दे बिछाये होते हैं वो फट जाते हैं,उस में से रुई उड़ती है,हर तरफ रुई रुई उड़ती है ,इस को *पाहन्ढ़ी विजय* बोला जाता है ,यानी पैदल पैदल ले कर जाना ।

    अब जगन्नाथ जी सिंह द्वार से बाहर आते है ,चारो और कालिया, कालिया, कालिया आयो रे ,की आवाज़े आने लगती हैं , अब महाप्रभु जी भी जगन्नाथ जी को आता देखते हैं,महाप्रभु के एक तरफ स्वरूप दामोदर जी है,एक और राय रामानंद जी हैं , महाप्रभु जी जगन्नाथ जी के दर्शन करते ही महाभाव अवस्था में आ जाते हैं,राय रामानंद को बोलते है ,"अरे देख ना ,देख ना ,अरे देख ना ललिते मेरे प्राण धन आ गये ,देख ,देख ,देख ,कैसे हिलते आ रहे हैं" ।कभी स्वरूप दामोदर को बोलते है ,"अरे तू भी देख विशाखा" ,बहुत रूदन करते है महाप्रभु ,राधा भाव में आविष्ट हो जाते हैं,"अरे आ गये ,आ गये ,आ गये ,आ गये ,ललिता देख कितने सुन्दर लग रहे हैं ,देख ना विशाखा ,मेरे प्राण आ रहे हैं ,क्या शोभा है मेरे प्रिय की ,आ गए ,आ गये ,आ गये ललिता, आ गये मेरे प्रियतम "ये बोलते बोलते अचेत हो गिर  जाते हैं महाप्रभु ।
🙏( दास मानव )

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