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*रथ यात्रा लीला 4*

   कल हम सब ने सुना कैसे महाप्रभु जी अपने शीश से रथ को धक्का देते हैंऔर रथ चल पडता है ।चारो और हरि बोल की गूंज हो जाती है ।

     अब उन्मत नृत्य कीर्तन चल रहा है ,रथ को चलता देख , जगन्नाथ जी को रथ मे बैठे देख महाप्रभु फिर राधा भाव में आविष्ट हो जाते हैं ,अब महाप्रभु जी कितना कितना ऊँचा उछल उछल नृत्य कर रहे हैं ,सब भक्त जन महाप्रभु जी का दर्शन कर रहे हैं ।जिस भक्त पर महाप्रभु जी का आंसू गिर जाता उस में भी ऊर्जा का संचार हो जाता,वो भी पागलों की भान्ति नाचने लग जाता । महाप्रभु जी के परिकर सब उन के दर्शन का आनन्द ले रहे हैं,क्युंकि वो जानते है ,जगन्नाथ जी और महाप्रभु में कोई भेद नही है।क्युंकि महाप्रभु जी को सचल जगन्नाथ  कहा जाता है और जगन्नाथ जी अचल जगन्नाथ कहा जाता है ,अब राधा भाव में आविष्ट हो कर रस्सा पकड लिया और रथ खींच रहे हैं और इस समय भाव क्या है  ।भाव यह है कि  रस्सा खींच कर जगन्नाथ जी को वृन्दावन ले जाना है ,राधा  भाव में महाप्रभु जी, बोल रहे हैं,"हे नंदनंदन  !हे श्याम सुन्दर ! 100 साल बीत गये  ,आप तो 2 दिन की कह कर गये थे ,क्या अपराध बना हम से ,क्या आप सब भूल गये ,वो महारास,वो बंसी नाद,ये वृन्दावन ,मथुरा सब भूल गये?आप हमें रोते हुये छोड गये सब को ,वो आप को माखन का चोरी करना,वो कुन्ज की गलियों में बिहार करना,क्या ये भी भूल गये ?आप के बिना ब्रज सूना हो गया,अब ना जाने दूंगी वापिस आप को ,अब ना जाने दूंगी ,अब ना जाने दूंगी  , हाँ हाँ नही जाने दूंगी अब आप को "

   एक दम पछाड़ खा कर गिर जाते हैं।सेवक अभी दूर है राजा प्रताप रुद्र ने देखा महाप्रभु को ना पकडा तो श्री अंग पर चोट ना आ जाए तो राजा ने महाप्रभु को पकडा। लेकिन ये क्या महाप्रभु जी के  स्पर्श पाते  ही राजा में  कृष्ण नाम का हिलोर आ गया ,सेवक भागते आ गये लेकिन महाप्रभु का तो विरह और तेज़ हो गया , अब रथ चलता जा रहा है ,लेकिन ये क्या अब तो रथ फिर से रुक गया ।आज भी पुरी धाम में ये लीला होती है ,अपनी मर्ज़ी से रथ चलता है और अपनी मर्ज़ी से रुकता है ।बहुत भोग आरती हुई ,बड़े मनोरथ किये गये ,लेकिन रथ नही हिल भी नही रहा ,तो उस समय पण्डेय,पुजारी को स्वपन आते हैं। स्वपन में जगन्नाथ जी ने बताया मेरा एक मुस्लिम भक्त है साल्वेग,वो भी वहीं खड़ा है ,जब तक उस को दर्शन ना दे दूं,जब तक उस के हाथ से फूल, चन्दन,तुलसी ना ले लूँ,तब तक रथ नही चल सकता ।अब तो पुजारी जोर जोर से बोल रहे है  कौन है साल्वेग?कौन है साल्वेग ?आ जाओ रथ पर ,तुलसी ,चन्दन ,फूल चढ़ा लो,कौन है साल्वेग ?तो आवाज़ आयी ,मै साल्वेग हूं ,मै हूं साल्वेग ,मै ही हूं साल्वेग 
( दास मानव )

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