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*रथ यात्रा लीला 3*


   आज बहुत उन्मत हो नृत्य कर रहे हैं श्री मन महाप्रभु जी ।रथ के आगे ,हज़ारो भक्त जन रस्सा खींच रहे है ,लेकिन रथ नही चल रहा , लेकिन महाप्रभु जी तो राधा भाव मे आविष्ट हो भाव विभोर हो रहे हैं। ये सब देख राजा प्रताप रुद्र ने 10,000 हाथी बुलवा लिये ,हाथियों से रथ की  रस्सी बाँध दी ,लेकिन ये क्या रथ तो हिला भी नही ? लेकिन एक भक्त ने आ कर राजा से कहा ,"राजा जी ,जब तक श्री महाप्रभु रथ के आगे नृत्य कर रहे हैं, रथ नही चल सकता,महाप्रभु के नृत्य लीला को देख जगन्नाथ जी नही चलने वाले ।महाप्रभु जी को देख रहे हैं राजा प्रताप रुद्र जी ,और सोच रहे हैं कैसा प्रेम है इनका जो इतना रूदन कर रहे है ,और महाप्रभु जी इतना रूदन करते हैं की उनके आँसुओ से ज़मीन पर  कीचड़ हो जाता है।

      हम कल्युगी जीव इस बात को नही मान सकते कि कितने आंसू होंगे की कीचड़ हो गया होगा ? लेकिन ये तो वही जान सकता है जिस ने देखा होगा ,ये सब उस समय के भक्तों ने अपनी आंखो से देखा है,भक्तों द्वारा लिखे ग्रंथ हैं।एक मात्र श्री मन महाप्रभु जी ही हैं जिनके बारे में उन्ही के काल मे लिखा गया, यानी उन की प्रगट लीला मे ही भक्तों ने उनका चरित्र उन्हीं के काल मे छिप छिप कर लिखा।नवदीप लीला को मुरारी गुप्त ने देखा और उन्हीं के काल में नवदीप लीला लिखी ,और नीलांचल लीला को स्वरूप दामोदर जी ने देखा और जो देखा बस वैसी  ही लीला छिप छिप   कर लिखी जिस को *कडचा* कहते है ।

      अब तो प्रताप रुद्र जी अपने मन्त्री हरि चन्दन के कन्धे पर हाथ रख पीछे खडे हो महाप्रभु जी के दर्शन कर रहा है ,अरे ये कैसा रूदन इतना जल आंखो से निकल रहा है,अब तो राजा एक दम हैरान हो गया जब देखा की रथ पर बैठे श्री जगन्नाथ जी महाप्रभु की ओर देख कर  रो रहे हैं ।भक्त का रूदन सहन नही हो रहा जगन्नाथ जी को और रो रहे हैं, अब तो राजा अचेत हो गया ।जब उसने देखा की रथ पर तो महाप्रभु जी बैठे हैं और जगन्नाथ जी नीचे रूदन कीर्तन कर रहे हैं ,कभी जगन्नाथ जी रथ पर कभी महाप्रभु जी ।राजा जान गया जगन्नाथ और महाप्रभु जी में कोई भेद नही है, अब तो महाप्रभु जी से प्रार्थना की गई "महाप्रभु जी ! 10000 हाथी लगा दिये  लेकिन रथ नही चल रहा ",तो महाप्रभु जी बोले सब रस्से छोड दो ,सब हाथी हटवा दो ,और श्री मन महाप्रभु जी रथ के पीछे जा कर अपने शीश से रथ को धक्का देते हैं और उसी समय रथ चल पड़ता है ,चारो और जय हो ,जय हो ,हरि बोल की ध्वनि से पूरा पुरी धाम गूंज जाता है ,और भक्त जन रस्से खींचे हरि बोल करते चल पड़ते हैं।
( दास मानव )

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