चैतन्य वन्दना1

श्री चैतन्य स्वरूप को मन वच करूँ प्रणाम ।सदा सनातन पाइये, श्री वृन्दावन धाम ।।

गौर नाम अरू गौरतनु, अन्तर कृष्ण स्वरूप।गौर साम्वरे दुहुन को प्रकट एकहि रूप।।

तिन के चरण प्रताप ते , सर्व सुलभ जग होय।गौर साम्वरे पाइये आप आपन को खोय ।।

वृन्दावन विहरहि सदा, गहे परस्पर वाँह ।लालच तिनके मिलन को, उपजी परो जिय माहँ।।
उत्कण्ठा अङ्कुर कॅहू, उठ्यो हियमेँ आय।ताकी तुम रक्षा करौ,कवहु उखरि मति जाय ।।

डुलहि न पवन झकोर ते, जौ लो नही दृढ़ मूल।विघ्न न कोउ कर सकै, रहहि सदा अनुकूल ।।

पूरणमासी तुम करो, सदा अमृत की सीँच । यह अङ्कुर भीजो रहे सदा प्रेम की कीँच ।।
अहो ! विशाखा सहचरी, तुम सव रस की मूल ।यह उत्कण्ठा वेलि ज्यों नखसीख फूलै फूल ।।

हो ललितादिक तुम सवै, मिलि सीँचौ रस तोय । यह उत्कण्ठा माधुरी, वेग सफल ज्यों होय ।।

श्री वृन्दावन स्वामिनी, करी सुदृष्टि इहि ओर । वृष्टि करौ अनुराग की, कृपा कटाक्षन कोर ।।

अहौ ! लडैती विन कहे, जानि लेउ जीय वात । चरण तिहारे सॅग विन, मोहि न कछु सुहात।।

पलक एक रहे, कोटि सम, अलप कलप सम होय । जो उपजे जियमेँ सदा,समझि सके नहि कोय ।।
कहि कहि काहि सुनाइये, सहि सहि उपजे शुल । रहि रहि जिय एसे जरै, दहि दहि उठे दुकूल ।।

विरह अग्नि उर में वडि , तप्यौ अवनि तनु जाय।सुरत तेल तापर परै, कहु किहि भाँतिसिराय ।।

यह उत्कण्ठा की लता, चली वेग मूरझाय । सङ्ग दामिनी श्यामघन, जो वरषे नही आय ।।

रोम रोम तन जरि उठै, वरि वरि उठे शरीर । कव छिरकौगे आनि कै, कृपा कटाक्षन नीर ।।

गिरि वन पुलिन निकुञ्ज गृह, सको देखि नही नैन । सदा चकित देखत फिरो, कॅहु न धरति चित चैन ।।
क्रमशः---

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