गौर के घुंघरू (यश कुंवर जु)

मेरे गौर के घुंगरू, बाजे छम छम छम, सीष पे विराजे काले घुंगराले काले केश की नागिन सी लट, वो बिखरती जुल्फों से गुजरती पवन के सौंधी सी महक, टिमटिमाते नयन तारे जैसे पृर्णिमा का चांद, तीखी नासिका जैसे ऊंचे शिखर की चोटी। वो विशाल चमकता कटि प्रदेश जैसे हो धरा पर्वत का वेश,,

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